Friday, 9 December 2016

पाकिस्‍तान का किसान

खेती के संकट से गुजर रहा पाक किसान

पाकिस्तान में भी डब्ल्यूटीओ के दबाव में खेती और किसान को खत्म करने का कुचक्र रचा जा रहा है

अनिल चौधरी
खेती-किसानी वास्तव में घाटे का सौदा साबित हो रहा है। इसकी अहम वजह है सरकारों की उपेक्षा। ऐसा नहीं कि ये हालात भारत या फिर किसी दूसरे राष्ट्र के हों बल्कि दुनियाभर के किसानों की हालत एक जैसी ही है। सबसे शक्ति संपन्न देश अमेरिका में भी हर साल खेती छोड़ने वाले किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में विकसित देशों के किसानों की दशा का अंदाजा सहज रूप से लगाया जा सकता है। पचास साल पहले यानि आज की तथाकथित औद्योगिक क्रांति से पहले किसी भी देश की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की एक चौथाई तक भागीदारी होती थी लेकिन वह धीरे-धीरे लगभग नगण्य होती जा रही है। किसान पिस रहा है। खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है। ऊपर से मल्टीनेशनल कंपनियां जीएम और हाईब्रिड सीड लेकर विकासशील देशों की खेती पर नजर गड़ाए हैं। परिणामतया किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं या फिर उसकी चपेट में हैं। पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान में तो किसानों के हालात और भी बदतर हो गए हैं। वहां के किसान संगठन आशांकित हैं कि समय रहते पाक किसानों को सरकार ने बचाने की रणनीति नहीं बनाई तो किसान तो मरेगा ही देश में भुखमरी की हालत पैदा हो जाएगी। दिसंबर के आखिरी सप्ताह में भारत के दौरे पर आए किसानों के एक सात सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल से पाकिस्तान की कृषि की हालत जानकर तो यही लगता है।
पाक प्रतिनिधिमंडल ने जो खुलासा किया वह बेहद चौंकाने वाला था। पाकिस्तान में आज भी 67 फीसदी आबादी देहात में रहती है जो खेती करती है या फिर खेती पर निर्भर है। पाक में 88 फीसदी स्मॉल फार्मर हैं और इनके पास मात्र 48 फीसदी जमीन है। बाकि 12 फीसदी किसानों या कहें धनकुबेरों के पास 52 फीसदी जमीन है। और ये वही धनकुबेर हैं जो देश की सत्ता चलाते हैं। यानि यही तथाकथित किसान और रजवाड़े कृषि नीति बनाते हैं। या यूं कहें कि इनकी वजह से ही आज तक किसानों के हितों के लिए कोई नीति ही नहीं बनाई गई। सोने पर सुहागा यह रहा कि गत वर्षों में डब्ल्यूटीओ के दबाव में पाक सरकार ने मझोले किसानों को बिजली, खाद, पानी आदि पर दी जाने वाली सब्सिडी भी खत्म कर दी। नतीजतन छोटे किसानों की कृषि में उपज लागत और बढ़ी और यह उसी अमेरिका के कहने पर किया गया जो अपने किसानों को खुलकर सब्सिडी दे रहा है।
खेती-किसानी की अनदेखी का ही नतीजा है कि पाकिस्तान में सन् 1995-98 तक बजट का 25 फीसदी हिस्सा खेती के लिए दिया जाता था और अब इसका हिस्सा घटकर मात्र 1.5 फीसदी ही रह गया है। सुनकर हैरत होती है कि सन् 2000 तक पाक की जीडीपी में खेती का योगदान 23 फीसदी था और अब यह घटकर मात्र 3 फीसदी तक सिमट गया है।
प्रतिनिधिमंडल ने इस बात का खुलासा किया कि वर्तमान हालात में किसानों को फसलों के दाम मिल नहीं रहे हैं। पानी की लगातार कमी होती जा रही है। हरित क्रांति के बाद बेतरतीब खेती करने से कैमिकल और कीटनाशकों के अंधाधुंध दोहन से जमीन की उत्पादकता को खत्म कर दिया है और इसी वजह से पैदावार कम हो गई है। जमीन में जलस्तर जो एक दशक पहले तक 35 फीट हुआ करता था अब 60 से 70 फीट तक जा पहुंचा है। देश के अधिकांश इलाकों में पानी के लिए टयूबवेल बनाने की हिम्मत आम किसान में नहीं है। टयूबवेल लगा भी ले तो उसका बिजली का बिल ही 60 से 70 हजार रुपए महीना बैठता है जो एक  बड़े किसान के बस से भी बाहर की बात है। ऐसी स्थिति में वहां की सरकार नहरों का नीजिकरण कर रही है और ऐसा  हुआ तो किसान की हालत और बिगड़ेगी क्योंकि नीजि कंपनियों के हाथ में पानी चले जाने से किसान सिंचाई का मूल्य ही चुकाने की स्थिति में नहीं होगा। यही नहीं भारत के मुकाबले आकलन किया जाए तो पेट्रोल और डीजल के दाम भी वहां काफी ज्यादा यानि 57 रुपए प्रति लीटर हैं। ऐसे में किसान डीजल पंप की भी हिम्मत नहीं जुटा सकता।
यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आजादी के बाद से दो बार जमीन सुधार किया गया। पहली बार अय्यूब खां के दौर में और दूसरा जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर में लेकिन उसका पाकिस्तान के अवाम पर व्यापक असर नहीं दिखाई दिया। हालात ये रहे कि इतना सब होने के बाद भी मात्र 12 फीसदी कृषि भूमि की ही चकबंदी हुई और बाकी जागीरदारों व रसूकदारों के कब्जे में ही रही। पाकिस्तान में मौजूदा समय में भी दो सबसे बड़े सियासतदारों जुल्फिकार अली भुट्टो और फारूक अहमद लग्गारी के पास खेती की जमीन है। वहीं मिर्जाफरउल्ला जमाली, सिंध में गुलाम मुस्तफा जतोई ऐसे सियासतदां हैं जिनका आधी से भी अधिक खेती पर कब्जा है। इन्हीं भूमाफियाओं की वजह से पाकिस्तान में आजादी के बाद से असली किसान को हक नहीं मिल पाया और न ही वह इन सियासतदारों के सामने अपनी जबान ही खोल पाए क्योंकि लोकतांत्रिक सरकार का कभी पाक में वजूद ही नहीं रहा और मिलिट्री हुकूमत से टक्कर लेने की हैसीयत में किसान कभी रहा नहीं। कभी उनको संगठित भी नहीं होने दिया गया।
खेती का एक स्याह चेहरा डब्ल्यूटीओ पर दस्तखत करने के बाद से भी उभर रहा है जिसने किसानों को बेचैन कर रखा है और इसीलिए वह बाहर निकल किसानों के संगठनों में शामिल होने की छटपटाहट में भी है। किसानों ने खुलासा किया कि मल्टीनेशनल को छूट दी जा रही है और हाईब्रिड सीड व जीएम सीड के नाम पर किसानों को महंगे दामों पर बीज बेचने का हरसंभव प्रयास किया जा रहा है। मगर किसानों का तजुर्बा यह रहा है कि ऐसे बीजों की पैदावार आम बीज के मुकाबले कम है जबकि महंगे बीज के साथ ही उन पर ज्यादा मेहनत करने के साथ ज्यादा खाद-पानी और स्प्रे का बोझ बढ़ गया है। मुकामी (परंपरागत) बीजों को आहिस्ता-आहिस्ता बाजार से गायब किया जा रहा है और पिछले चार सालों से यह सिलसिला चल रहा है। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि बीटी काटन की खेती को सरकार ने अभी मंजूरी नहीं दी है लेकिन चोरी-छिपे इसकी खेती बड़ी मात्रा में की जा रही है और उम्मीद है कि सरकार शीघ्र ही इस कंपनी को यहां इजाजत देने जा रही है। जबकि बीटी काटन की खेती के दुष्परिणाम भारत समेत अन्य देश भी बेहतर देख चुके हैं। पहले बीटी काटन के बारे में स्टडी प्रकाशित की गई कि 28 किग्रा प्रति एकड़ में कीटनाशक का छिड़काव किया जाता था लेकिन बीटी के बीज से यह मात्र पहले साल में 14 किग्रा प्रति एकड़ हो गया और दूसरे साल 7 किग्रा रहा गया लेकिन तीसरे साल में यह फिर से 28 किग्रा प्रति एकड़ जा पहुंचा। चीन की रिपोर्ट ही इस बात का खुलासा करती है कि वहां इस बीज से खेती को नुकसान हुआ। किसान संगठनों की चिंता है कि 1960 में बीटी काटन के बीज में 5-7 कीड़े थे और अब दो दर्जन से अधिक हो गए हैं। पाकिस्तान काटन का चौथा बड़ा एक्सपोर्टर देश है जहां पर मल्टीनेशनल्स की नजर लगी हुई हैं। गत वर्ष पाक ने एक बिलीयन डालर की कॉटन का एक्सपोर्ट किया। चूंकि खेती लायक सिंध में सबसे बेहतर जमीन है इसलिए वहां पर 60 से 70 फीसदी कॉटन की खेती बीटी के बीज से चोर दरवाजे से की जा रही है। किसानों को फायदा गिना बरगलाया जा रहा है। अब तो यह भी स्पष्ट हो चुका है कि बीज पर जिसका अधिकार होगा फूड चेन पर भी उसी कंपनी का अधिकार होगा इसीलिए ऐनकेन प्रकारेण तमाम मल्टीनेशनल्स कंपनियों की निगाहें तीसरी दुनिया के देशों की खेती पर टिकी हुई हैं। जबकि शक्ति संपन्न अमेरिका की बात करें तो वहां 2002 में 9 लाख किसान थे और दो साल में ही दो लाख किसान खेती से बाहर हो गए। आंकड़े बता रहे हैं कि यूरोप में हर मिनट एक किसान खेती छोड़ रहा है। यह खतरनाक खेल मल्टीनेशनल कंपनी ही खेल रही हैं। खेती को घाटे का सौदा बता उस पर एकाधिकार पाने की जद्दोजहद में ये कंपनियां लगी हैं और विकासशील देशों की सरकारें इनके सामने घुटने टेकने को मजबूर हो रही हैं।
यही वे तमाम कारण है जिससे पाकिस्तान का किसान बेहद डरा हुआ है। पाकिस्तान किसान इत्तेहाद ने पाक में विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही स्वयं सेवी संस्थाओं खासकर किसान संगठनों को एकजुट करने का काम किया है। साथ ही दुनियाभर के दूसरे मुल्कों के किसान संगठनों से मिलकर खेती-किसानी को बचाने का बीड़ा उठाया है। इस संगठन के बैनर तले इस समय पचास से भी अधिक किसानों के संगठन अपनी आवाज को बुलंद कर रहे हैं। पाकिस्तान किसान इत्तेहाद के अध्यक्ष तारिक महमूद चौधरी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि अमेरिका परस्त नीतियों के सामने पाक सरकार घुटने टेक रही है और डब्ल्यूटीओ पर हस्ताक्षर करने के बाद मल्टीनेशनल कंपनियों की पॉलिसी खेती के क्षेत्र में भी लागू करने पर आमादा है जिसका पुरजोर विरोध करने के साथ ही वहां के किसानों को इसके नफा-नुकसान की जानकारी दी जा रही है। तारिक महमूद इस बात से भी काफी परेशान दिखे कि पाक की सरकार खेती से नियंत्रण हटा उसको नीजि हाथों में सौंपने की तैयारी में है। काटन और बासमती चावल में पाक का कोई सानी नहीं है इसीलिए मल्टीनेशनल इस खेती पर गिद्धदृष्टि लगाए हैं जिसका हम पुरजोर विरोध कर रहे हैं। उन्होंने आशा जताई कि दूसरे मुल्कों खासकर हिन्दुस्तान के किसान संगठनों से बात कर उन्हें संबल ही नहीं मिला बल्कि इस कुचक्र से बचने का मूलमंत्र भी मिला है। इसके लिए एशिया के सभी किसान संगठनों के साथ मिलकर वह विकसित देशों के खेती को चौपट करने वाले षड़यंत्र के खिलाफ आवाल बुलंद करेंगे। साथ ही किसानों को भी ताकीद करने का काम करेंगे ताकि समय रहते जल-जंगल और जमीन को बचाया जा सके।
जाहिर है ऐसे में दुनियाभर के किसानों व किसान संगठनों को इस मुसीबत का सामना करने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत रणनीति बनानी ही होगी वरना न खेत बचेंगे न खेती और न ही किसान और पाकिस्तान के किसान संगठन भी इसके लिए कमर कसते दिख रहे हैं। (जनवरी 2009 को पाकिस्तान से आए किसान प्रतिनिधिमंडल से बातचीतके आधार पर तैयार लेख )


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